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राजधानी होती गई आधुनिक, लेकिन आज भी अपना अस्तित्व बचाने जूझ रहा कुम्हार

* एकर का भरोसा चोला माटी के राम

न्यूज सर्च@रायपुर. छत्तीसगढ़ पृथक राज्य बनने के बाद रायपुर जिला राजधानी बना। वह दिन पर दिन आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन जिले में चाक चलाने वाले आज भी अपना वजूद तलाशते नजर आ रहे हैं। आधुनिकता के दौर में लोग पारंपरिक सामानों की खरीददारी नहीं कर रहे हैं, लेकिन रायपुरा के 200 कुम्हार जाति के परिवार आज भी पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तन बनाकर अपना पेट पाल रहे हैं। उनकी बस एक ही पीड़ा है कि सरकार उनके विकास के लिए कुछ नहीं कर रही है। यदि सरकार मदद करे तो वह अपने इस पारंपरिक व्यवसाय से ही अच्छी जिंदगी जी सकते हैं।
कुम्हारों से जब इस बारे में बात की तो उनकी पीड़ा कुछ इस तरह सामने आई। 58 वर्षीय भूखन लाल चक्रधारी जो कि मात्र 5वीं पास हैं और अपने पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि वह 18 साल की उम्र से यही काम करते आ रहे हैं। उनके साथ इस काम में उनका ग्रेजुएट बेटा छन्नू भी मदद करता है, लेकिन दो लोगों की कमाई से घर चलना भी मुश्किल हो रहा है। घर में चक्रधारी के अलावा उनकी पत्नी, दो बेटा, दो बहू और उनके बच्चे हैं। चक्रधारी का कहना है कि वह और उनका बेटा मिलकर दिन भर में 200-250 छोटी कलोरी बना लेते हैं। इनको बेचने के बाद यदि कुल खर्च काटा जाए तो उनकी एक दिन की रोजी 50 से 60 रुपए ही आती है। ऐसे में उनके सामने पेट पालने की भी समस्या आ रही है। चक्रधारी का कहना है कि सरकार भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आ रही है। उन्हें अब तक इलेक्ट्रॉनिक चाक तक नहीं मिला, जिससे वह पारंपरिक चाक से बर्तन बनाते हैं। इसमें अधिक मेहनत और समय दोनों लगता है।
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पारंपरिक से लेकर आधुनिक चीजों का निर्माण

चक्रधारी का कहना है कि वह सिर्फ कलोरी ही बनाते हैं, लेकिन कई कुम्हार ऐसे भी जो कि बच्चों के गुल्लक से लेकर डिजाइनर दिये व घरों के सामने टांगने वाले छोटे-छोटे विंड चेन, घड़े व अन्य जीजें बनाते हैं। इनकी बिक्री कम होने से इन्हें बनाने वाले कम ही लोग हैं।
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राज्य माटी कला बोर्ड भी नहीं दे रहा ध्यान

मिट्टी की इस सिमटती परंपरा को बचाने और इसे आधुनिक रंग देने के लिए राज्य में माटी कला बोर्ड ने कुछ पहल की थी। कुछ कुम्हारों को इलेक्ट्रॉनिक चॉक देने बाद उसने भी आगे कुछ नहीं किया। हालत यह है कि अब तक राज्य में इलेक्ट्रिक भी  तक नहीं बनी। इससे लकड़ी से बर्तन पकाने को कुम्हार मजबूर हैं। 600-650 रुपए लड़की मिलने से उनका मुनाफा काफी कम हो जाता है।
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युवा चाक चलाने में नहीं दिखा रहे रुचि

चक्रधारी बताते हैं कि नई पीढ़ी अब चाक पकडऩे को तैयार नहीं है। उनके दो बेटों में एक ही बेटा उनका पारंपरिक व्यवसाय संभाल रहा है। इसी तरह अन्य परिवारों में नई पीढ़ी कमाई न होने से अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ती जा रही है।
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फ्री की माटी, लेकिन भाड़े से परेशान

चक्रधारी बताते हैं कि उन्हें खारून नदी के किनारे से माटी तो फ्री में मिल जाती है, लेकिन उसे लाने में 2000-2500 रुपये प्रति टैक्टर भाड़ा लग जाता है। इससे आज जितनी एक दिए की लागत बढ़ गई है, उतनी उनकी कीमत नहीं बढ़ी है।
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चाइनीज दियों ने छीना मुनाफा

कुम्हार जाति के लोगों का कहना है कि एक दौर था, जब वह दीपावली के त्यौहार का बेसब्री से इंतजार करते थे। क्योंकि उस समय मिट्टी के दीयों और छोटी कलोरी की मांग बहुत रहती थी। बाजारों में इनके खरीददारों की भीड़ नजर आती थी। आज चाइनीज दियों ने उनका मुनाफा ही छीन लिया है। चाइनीज दियों की चमक ने ग्राहकों को अपनी ओर खींच लिया, जिससे उनकी कुम्हारों के दियों की बिक्री ही कम हो गई है।

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सीधी बात- सुधाकर खलखो, प्रबंध संचालक, छत्तीसगढ़ माटी कला बोर्ड

प्रश्न- माटी कला बोर्ड कुम्हारों के लिए क्या कर रहा है?
उत्तर- बोर्ड का बजट काफी कम है। बजट के मुताबिक हम बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रश्न- दीवाली में दियों की ब्रिकी बढ़ाने के लिए बोर्ड ने क्या किया?
उत्तर- बोर्ड की मदद से इस बार 3 लाख रुपए के मिट्टी के दिए बेचे गए हैं। 
प्रश्न- कुम्हारों को बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में क्या पहल हुई है?
उत्तर- स्थाई बाजार दे पाना तो मुश्किल है, लेकिन हर साल निगम की मदद से तेलीबांधा में स्टॉल लगाने की व्यवस्था की जाती है, जिससे कुम्हार अपनी आय बढ़ा सकें।
प्रश्न- कुम्हारों के उत्थान के लिए क्या पहल की जा रही है?
उत्तर- बोर्ड के द्वारा उन्हें डिजाइनर दिए बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। इसके साथ ही कौशल और व्यवसाय उन्नयन के लिए भी ट्रेंड किया जाता है।
प्रश्न- अभी भी कुम्हार पारंपरिक चाक के भरोसे व्यवसाय कर रहे हैं क्या पहल हो रही है?
उत्तर- हमारे पास 30 हजार कुम्हारों का रजिस्ट्रेशन है। इसमें से 6 हजार कुम्हारों को इलेक्ट्रिक चॉक दिया गया है। बाकी को देने की योजना चल रही है। छत्तीसगढ़ पहला ऐसा राज्य है जो फ्री इलेक्ट्रिक चॉक देता है।
प्रश्न- कम्हार आज भी लकड़ी की भ_ी जला रहे हैं क्यों?
उत्तर- हमने इलेक्ट्रिक भ_ी के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा है। मंजूरी मिलते ही उन्हें इसकी सुविधा दी जाएगी।

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