इंदिरा गांधी ने देखकर कहा, यह फिल्म नेशनल अवार्डेड है
न्यूज़ सर्च@रायपुुर:- बाल्मीको नाग स्मृति में शहर के संस्कृति विभाग में आयोजित पांचवा अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का गुरुवार को शुभारंभ हुआ। पहले दिन छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेश, नकेड, प्रपोजल फिल्म लोगों को दिखाई गई। इस दाैरान फिल्म के निर्माताओं ने लोगों से संवाद कर शार्ट फिल्म बनाने उद्देश्य पर बातचीत की।
मुंबई से कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे फिल्म कहि देबे संदेश के निर्माता मनु नायक से हुई बातचीत में अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया, यह फिल्म मेरी पहली और अंतिम थी। इसे 1964 में बनाया था, जो 1965 में पूरे छत्तीसगढ़ में बेहद विराेध में रिलिज हुई। इस वजह फिल्म की कहानी थी। फिल्म में एक ब्राम्हण लड़की को हरिजन व्यक्ति से प्यार हो जाता है। इसका काफी विरोध मुझे देखना पड़ा था। इस विषय पर फिल्म बनाकर समाज में बदलाव लाने का प्रयास करनी चाहत थी।
जब इंदिरा गांधी ने देखी फिल्म
मनु नायक ने बताया, फिल्म रिलिज होने के बाद लोगों के धमकी भरे संदेश मुझे मिलते थे। जब छत्तीसगढ़ में फिल्म को विराेध अधिक होने लगा तो तत्कालीन सांसद मीना माता के पास गया। उस समय इंदिरा गांधी सुचना व प्रसारण मंत्री थी। सांसद ने फिल्म के समर्थन में इंदिरा गांधी के पास गई और उन्हें फिल्म देखने का अनुराेध किया। फिल्म देखने के बाद इंदिरा गांधी ने कहां था, फिल्म का संदेश समाज निर्माण का है। यह नेशनल अवार्डेड है। फिल्म का विरोध 4 महीने तक चला। इस दौरान कई बार भोपाल, दिल्ली, मुंबई के चक्कर काटने पड़े मुझे। सरकार ने फिल्म को समाज निर्माण कहां, लेकिन फिर भी लोगों ने इसे नहीं स्वीकार किया। लंबे समय के बाद यह फिल्म दूरदर्शन के माध्यम से विभिन्न राज्यों में दिखाई गई। विरोध के कारण लोग मुझे किसी काम में रखना पंसद नहीं करते थे।
मोहम्मद रफी ने गाए थे गाने
फिल्म की शुटिग मुबंई में हुई। 1 लाख की लागत में इसे बनाया गया था। मनु नायक ने बताया, फिल्म में संगीतकार मोहम्मद रफी ने छत्तीसगढ़ी में झमकत पिया नदियां बहाएं.., तोर पैरी के घनर-घनर दो गाने गाए थे। वही एक गाना मन्ना डे ने। दोनों को काफी दिनों तक छत्तीसगढ़ी भाषा समझाना पड़ा था। फिल्म बनाते वक्त लोगों का काफी सहयोग मिला था। इसलिए बनाने में काफी मेहनत भी लगी थी। अभी तक फिल्म पर 4 किताबे बन चुकी है। कई राज्यों में इसे दिखाया जा चुका है। उनका कहना है, जिस समय यह फिल्म बना रहा वह उस समय फिल्म देखने वालों को अवारा कहा जाता था। और मैं तो निर्माता था।